Badalta Zamana

सूना था वक़्त रुकता नहीं, बहता है, बदलता है, बस राह अपनी;Tech
जाने कब खो गए वो दिन प्यारे
जाने कब छूट गए वो लोग सारे,
बच गई तो बस कुछ एहसास न्यारी,
रूठ गई क्या हमसे ये ज़िंदगी प्यारी?

बदल गई क्या वो सूरज की रोशनी निराली,
बदल गई क्या वो चिड़ियों की ची ची प्यारी,
या बदल गई पवन की शीतलता सारी,
बदल गई क्या बचपन की कोमलता क्या री?
बदल गई क्या मानवता की जीविका सारी,
बदल गई किताबो की पंक्तियाँ सारी,
रूठ गई क्या हमसे ये ज़िंदगी प्यारी?

दब गई क्या साँसे इन मशीनों मे सारी,
बह गई क्या ज़िंदगी इन मजबूरियों मे सारी,
रह गई तो बस ये तकनीकियाँ सारी;
कभी मोबीलें तो कभी कई और तकनीकियाँ आईं,
बह चले वो खत,बन के कश्तियाँ सारी,
बह चले वो वक़्त,भारी थी जिसमे हमारी किलकारियाँ प्यारी,
बस रह गई तो बस ये ये तकनीकियाँ सारी,

बस रह गई तो ये उंगलियाँ निराली,
बनती है जिससे आज ये तकनीकियाँ सारी,
क्या नही रुकेंगी अब ये उंगलियाँ हमारी,
सच मे रूठ गई है क्या वो प्यारी ज़िंदगी हमारी?

सुनती थी जो सखियाँ बातें हमारी,
लाइक करती है वो अब हर साँसे हमारी,
बोलती थी जो तस्वीरे दबी बातें सारी,
होतो है बस आज उनकी नुमाइशे बारी बारी,
छुप गई है क्या सचमूच असलियत हमारी,
या बन गई है क्या फ़ेसबुक पुस्तक हमारी!
रूठ गई क्या अब वो ज़िंदगी हमारी?

बदलेगी क्या अब सारी आदतें हमारी,
या गुम जाएगी क्या बची सी कुछ ज़िंदगी हमारी,
आपएगी क्या वो हस्सी वापस सारी,कुछ वक़्त तो थी कभी बस ज़रूरत हमारी,
आ पाएगी क्या वापस वो इंसानियत सारी,या बन कर देगी क्या टेक्नीकी अब ज़ुबान हमारी,
मिल सकेगी क्या वो पहली ज़िंदगी सारी,
थी जिसमे बंद सच्चाई,प्यार,सादगी हमारी?
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  • twittendra

    waah