Prasoon Joshi Poem – Dedicated to the Girl Child :Extended

शर्म आरही है ना उस देश को,
जिसने ना जाने कितनी द्रौपदीयों का चीर हरण किया,

शर्म आरही है ना उन माँ बापों को ,
जो दहेज के नाम पे तौलते रहे उनके हुनर को,

शर्म आरही है ना समाज के बने हुए उन नियमों पर,
बाँध रखा जिसने इन्हें चार दीवारों के अंदर;

शर्म अराही है ना उन प्रथाओं पर,
जिसने आशाओं और ख़्वाबों को अपनी लौह मे जलाया,

शर्म अराही है ना उन कट्टरों पर,
जिन्होंने कभी पर्दों ,तो कभी घूँघटों मे इन्हें छुपना सिखाया;

शर्म आनी चाहिए हर उस परिवार को जहाँ बेटियों को ख़्वाबों की जगह ज़ुल्‍म का बोझ सहना परा!
शर्म आनी चाहिए उन परंपराओं को जिसने बेटियों  को बस सजना और सवरना सिखाया,
मिट्टी की मूरतों जैसे चुप रहना सिखाया,

समय बदलेगा ,बेटियों का हुनर झलकेगा,
बरसों से छुपे हुए खवाब अंगराईयाँ लेंगी,
जन्म पर मातम नही खुशियों की किल्कारियाँ गूंजेंगी;
दो दिए ज़्यादा जलेंगे,आँगन में बोझ का टीका नहीं,गर्व का परचम लहराएगा |
सूरज को धूप खिलाना था,बेटी को तो अंधेरा मिटाना था |
घर की इज़्ज़त,आन,बान,शान का तिरंगा लहराना था |